184 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
हो गया। वहीं उनकी समाधि बनी, जिस पर लिखा है:
‘‘परमात्मा के एकत्व में विश्वास करने वाला एक सच्चा व दृढ़ व्यक्ति-उसने अपना समस्त जीवन मानव-एकता की उपासना में बिताया।’’
इंग्लैंड में अपने एक अंगे्रज़ मित्र की प्रार्थना पर राममोहन राय ने अपनी संक्षिप्त जीवनी लिखी थी, जिसमें वे कहते हैं, ‘‘सोलह बरस की अवस्था में मैंने मूर्ति-पूजा के विरूद्व एक पुस्तक लिखी। इस पर संबंधियों के साथ मतभेद के
184 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
हो गया। वहीं उनकी समाधि बनी, जिस पर लिखा है:
‘‘परमात्मा के एकत्व में विश्वास करने वाला एक सच्चा व दृढ़ व्यक्ति-उसने अपना समस्त जीवन मानव-एकता की उपासना में बिताया।’’
इंग्लैंड में अपने एक अंगे्रज़ मित्र की प्रार्थना पर राममोहन राय ने अपनी संक्षिप्त जीवनी लिखी थी, जिसमें वे कहते हैं, ‘‘सोलह बरस की अवस्था में मैंने मूर्ति-पूजा के विरूद्व एक पुस्तक लिखी। इस पर संबंधियों के साथ मतभेद के