स्वदेश प्रेम तथा हिन्दू और मुसलमान से समान प्रीति।
राममोहन राय को ‘ब्रह्यसमाज’ का प्रवर्तक कहा जाता है। पर यह एक भ्रान्ति मात्र हैं, इसमें कोई सत्य नहीं। उन्होंने जो आत्मीय सभा स्थापित की थी, उसे 1828 में ‘ब्रह्य-सभा’ में बदल दिया गया था और उसका आधार वेदान्त दर्शन था। उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके परम मित्र और सहयोगी द्वारकानाथ टैगोर और रामचन्द्र विद्यावागीश ने जैसे-जैसे इसे जारी रखा। लेकिन इसे ब्रह्यसमाज का नाम देने वाले
स्वदेश प्रेम तथा हिन्दू और मुसलमान से समान प्रीति।
राममोहन राय को ‘ब्रह्यसमाज’ का प्रवर्तक कहा जाता है। पर यह एक भ्रान्ति मात्र हैं, इसमें कोई सत्य नहीं। उन्होंने जो आत्मीय सभा स्थापित की थी, उसे 1828 में ‘ब्रह्य-सभा’ में बदल दिया गया था और उसका आधार वेदान्त दर्शन था। उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके परम मित्र और सहयोगी द्वारकानाथ टैगोर और रामचन्द्र विद्यावागीश ने जैसे-जैसे इसे जारी रखा। लेकिन इसे ब्रह्यसमाज का नाम देने वाले