186 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
और इसमें नव प्राण फूंकने वाले द्वारकानाथ टैगोर के बेटे और रवीन्द्रनाथ टैगोर के पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर (1817-1905) थे। उन्होंने 1843 में अपने बीस मित्रों के साथ ब्रह्यधर्म में दीक्षा ली। रोमां रोलां लिखते हैं, ‘‘वास्तव में वही ऐसे व्यक्ति थे जिन्हांेने ब्रह्यसमाज को संगठित किया और उसका नेतृत्व करने लगे। उन्होंने ही उसके विश्वास, आदर्श और अनुष्ठानों का निर्माण किया। उन्होंने उसी नियमित पूजा का संगठन किया,
186 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
और इसमें नव प्राण फूंकने वाले द्वारकानाथ टैगोर के बेटे और रवीन्द्रनाथ टैगोर के पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर (1817-1905) थे। उन्होंने 1843 में अपने बीस मित्रों के साथ ब्रह्यधर्म में दीक्षा ली। रोमां रोलां लिखते हैं, ‘‘वास्तव में वही ऐसे व्यक्ति थे जिन्हांेने ब्रह्यसमाज को संगठित किया और उसका नेतृत्व करने लगे। उन्होंने ही उसके विश्वास, आदर्श और अनुष्ठानों का निर्माण किया। उन्होंने उसी नियमित पूजा का संगठन किया,