के अनुसार नहीं था। ठाकुर भी चाहे उपनिषदों को मानते थे, पर उन्होंने अपने इस धर्म की नींव पश्चिम के तर्कवाद पर रखी थी। प्रसिद्व साहित्यकार अक्षयकुमार दत्त और राजनारायण बसु उनके प्रमुख सहयोगी थे। मूर्ति-पूजा आदि कर्म-कांड को इन लोगों ने त्याग दिया, पर समाज-सुधार में उनकी कोई रूचि नहीं थी बल्कि रक्षणशील देवेन्द्रनाथ हिन्दू समाज के साथ मेल की भावना ही से अपने नये धर्म का प्रचार करते थे। इस प्रचार का प्रभाव यह पड़ा कि हिन्दू
के अनुसार नहीं था। ठाकुर भी चाहे उपनिषदों को मानते थे, पर उन्होंने अपने इस धर्म की नींव पश्चिम के तर्कवाद पर रखी थी। प्रसिद्व साहित्यकार अक्षयकुमार दत्त और राजनारायण बसु उनके प्रमुख सहयोगी थे। मूर्ति-पूजा आदि कर्म-कांड को इन लोगों ने त्याग दिया, पर समाज-सुधार में उनकी कोई रूचि नहीं थी बल्कि रक्षणशील देवेन्द्रनाथ हिन्दू समाज के साथ मेल की भावना ही से अपने नये धर्म का प्रचार करते थे। इस प्रचार का प्रभाव यह पड़ा कि हिन्दू