नाममात्र को नहीं थी। उन्होंने एक प्रकार की संकीर्णता और कट्टरता के स्थान पर दूसरी प्रकार की संकीर्णता और कट्टरता अपना ली थी। शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यासों में जहां हिन्दू समाज की आलोचना की है, वहां ब्रह्यसमाजियों की संकीर्णता और कट्टरता का भी यथार्थ चित्रण किया है।
जहां क्रिया है वहां प्रतिक्रिया भी है। ब्रह्यसमाज के इन आक्रमणों से अपनी रक्षा के लिए प्राचीन पंथियों ने ‘हरिसभा’ स्थापित की। पंडित ससाधर तारकचुदामणि
नाममात्र को नहीं थी। उन्होंने एक प्रकार की संकीर्णता और कट्टरता के स्थान पर दूसरी प्रकार की संकीर्णता और कट्टरता अपना ली थी। शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यासों में जहां हिन्दू समाज की आलोचना की है, वहां ब्रह्यसमाजियों की संकीर्णता और कट्टरता का भी यथार्थ चित्रण किया है।
जहां क्रिया है वहां प्रतिक्रिया भी है। ब्रह्यसमाज के इन आक्रमणों से अपनी रक्षा के लिए प्राचीन पंथियों ने ‘हरिसभा’ स्थापित की। पंडित ससाधर तारकचुदामणि