थे और दर्शकगण ताली बजाकर उन्हें आकाश पर चढ़ा देते थे। एक ओर बह्यसमाज की वेदी से आचार्य और उपाध्याय वर्ग हिन्दू के धर्म एवं समाज के सिर पर अग्निमय अभिशापों की वर्षा कर रहे थे और उधर दूसरी ओर कट्टरपंथियों के दल घोर अश्लील कविताओं और कहानियों के माध्यम से ब्रह्यसमाज की दिखावटी साधुता का बड़ी बुरी भाषा में प्रतिवाद करने में लगे हुए थे। इस वाद-प्रतिवाद के फलस्वरूप एक ऐसे निन्दनीय, कुरूचिपूर्ण साहित्य की सृष्टि हुई, जो बंग साहित्य
थे और दर्शकगण ताली बजाकर उन्हें आकाश पर चढ़ा देते थे। एक ओर बह्यसमाज की वेदी से आचार्य और उपाध्याय वर्ग हिन्दू के धर्म एवं समाज के सिर पर अग्निमय अभिशापों की वर्षा कर रहे थे और उधर दूसरी ओर कट्टरपंथियों के दल घोर अश्लील कविताओं और कहानियों के माध्यम से ब्रह्यसमाज की दिखावटी साधुता का बड़ी बुरी भाषा में प्रतिवाद करने में लगे हुए थे। इस वाद-प्रतिवाद के फलस्वरूप एक ऐसे निन्दनीय, कुरूचिपूर्ण साहित्य की सृष्टि हुई, जो बंग साहित्य