के ललाट पर एक अमिट कलंक है।’’ (विवेकानन्द चरित, पृष्ठ 65)
कलकत्ता जब इन आन्दोलनों की क्रिया-प्रतिक्रिया से विक्षुब्ध हो रहा था तभी दक्षिणेश्वर से रामकृष्ण की ख्याति धीरे-धीरे फेलना शुरू हुई। हम देख चुके हैं कि वे एक अपढ़ प्रतिभा थे और विवेकानन्द के शब्दों में ‘ऊपर से भक्त भीतर से ज्ञानी’ थे। उन्होंने प्राचीन शास्त्रों को मौखिक रूप से सुना और उनके उत्कृष्ट तत्त्वों को
189 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
भली-भांति आत्मसात् किया था। वे अपनी श्लेषमयी भाषा में,
के ललाट पर एक अमिट कलंक है।’’ (विवेकानन्द चरित, पृष्ठ 65)
कलकत्ता जब इन आन्दोलनों की क्रिया-प्रतिक्रिया से विक्षुब्ध हो रहा था तभी दक्षिणेश्वर से रामकृष्ण की ख्याति धीरे-धीरे फेलना शुरू हुई। हम देख चुके हैं कि वे एक अपढ़ प्रतिभा थे और विवेकानन्द के शब्दों में ‘ऊपर से भक्त भीतर से ज्ञानी’ थे। उन्होंने प्राचीन शास्त्रों को मौखिक रूप से सुना और उनके उत्कृष्ट तत्त्वों को
189 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
भली-भांति आत्मसात् किया था। वे अपनी श्लेषमयी भाषा में,