जो सुबोध और सरल भाषण करते थे, ब्रह्यसमाज और हरिसभा में होने वाले भाषणों की उनसे कोई तुलना नहीं थी। जनसाधारण की तो बात ही क्या प्रत्येक सम्प्रदाय के साधु-संत और प्रोफेसर और विचारक उनके पास खिंचे आने लगे। रामकृष्ण ने पाश्चात्य की बाढ़ को रोककर ब्रह्यसमाज और हरिसभा के बीच में एक ऐसा मार्ग प्रशस्त किया, जिसने उत्साही और जिज्ञासु नवयुवकों को अतीत और परम्परा से जोड़ दिया और जिसने आस्थावानों की उच्छृंखला और कट्टरता दोनों की रक्षा की।
जो सुबोध और सरल भाषण करते थे, ब्रह्यसमाज और हरिसभा में होने वाले भाषणों की उनसे कोई तुलना नहीं थी। जनसाधारण की तो बात ही क्या प्रत्येक सम्प्रदाय के साधु-संत और प्रोफेसर और विचारक उनके पास खिंचे आने लगे। रामकृष्ण ने पाश्चात्य की बाढ़ को रोककर ब्रह्यसमाज और हरिसभा के बीच में एक ऐसा मार्ग प्रशस्त किया, जिसने उत्साही और जिज्ञासु नवयुवकों को अतीत और परम्परा से जोड़ दिया और जिसने आस्थावानों की उच्छृंखला और कट्टरता दोनों की रक्षा की।