रामकृष्ण परमहंस मूर्ति-पूजक और अनेकेश्वरवादी होते हुए भी अपने समय के सभी धर्म-प्रचारकों और विचारकों से अधिक लोकप्रिय हो गए। केशवचन्द्र सेन 1875 में उनके सम्पर्क में आए तो वे उनसे प्रभावित हुए बिना न रह सके। उन्होंने अपनी ‘संडेमिरर’ पत्रिका में लिखा कि ‘‘हिन्दुओं की मूर्ति-पूजा मूर्त रूप धारण किए हुए ईश्वरीय गुणों के अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु नहीं है। यदि इस मूर्त आकृति का त्याग कर दिया जाए तो जो शेष रह जाता है, वह एक
रामकृष्ण परमहंस मूर्ति-पूजक और अनेकेश्वरवादी होते हुए भी अपने समय के सभी धर्म-प्रचारकों और विचारकों से अधिक लोकप्रिय हो गए। केशवचन्द्र सेन 1875 में उनके सम्पर्क में आए तो वे उनसे प्रभावित हुए बिना न रह सके। उन्होंने अपनी ‘संडेमिरर’ पत्रिका में लिखा कि ‘‘हिन्दुओं की मूर्ति-पूजा मूर्त रूप धारण किए हुए ईश्वरीय गुणों के अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु नहीं है। यदि इस मूर्त आकृति का त्याग कर दिया जाए तो जो शेष रह जाता है, वह एक