योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

इसलिए धर्म चाहे किसी भी देश और किसी भी युग का हो उसकी मान्याताएं अंधश्रंद्वा और अंधविश्वास पर टिकी हुई हैं। इसीलिए जब तक धर्म है, धर्मान्धता भी किसी न किसी रूप में अवश्य रहेगी। वर्ग-विभाजित समाज में शोषक और शासक वर्ग अपने निहित स्वार्थों की रक्षा के लिए शोषित और शासित को धर्म की अफीम पिलाते हैं और पिलाते रहेंगे। मूर्ति-पूजा धर्मान्धता के अनेक रूपों में से एक रूप है। ईसाई मिशनरियों से भी पहले मुसलमानों ने अपने को ‘बुतशिकन’ कहकर मूर्ति-पूजा के खिलाफ जिहाद बोला,


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इसलिए धर्म चाहे किसी भी देश और किसी भी युग का हो उसकी मान्याताएं अंधश्रंद्वा और अंधविश्वास पर टिकी हुई हैं। इसीलिए जब तक धर्म है, धर्मान्धता भी किसी न किसी रूप में अवश्य रहेगी। वर्ग-विभाजित समाज में शोषक और शासक वर्ग अपने निहित स्वार्थों की रक्षा के लिए शोषित और शासित को धर्म की अफीम पिलाते हैं और पिलाते रहेंगे। मूर्ति-पूजा धर्मान्धता के अनेक रूपों में से एक रूप है। ईसाई मिशनरियों से भी पहले मुसलमानों ने अपने को ‘बुतशिकन’ कहकर मूर्ति-पूजा के खिलाफ जिहाद बोला,


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