हमारे कुछ शिक्षित बंधु, विशेषकर अपने को प्रगतिशील कहने वाले बुद्विजीवी विवेकानन्द की ऐतिहासिक भूमिका को समझने का तनिक भी प्रयास नहीं करते। वे विवेकानन्द को सिर्फ इसलिए प्रतिक्रियावादी कह देते हैं कि उन्हांेने मूर्ति-पूजा का समर्थन किया। सवाल यह है कि अगर राजा राममोहन राय, दयानन्द और केशवचन्द्र सेन के प्रचार से मूर्ति-पूजा दूर नहीं हुई तो क्या एक विवेकानन्द के विरोध से दूर हो जाती? ये तथाकथित बुद्विजीवी कभी नहीं समझ
हमारे कुछ शिक्षित बंधु, विशेषकर अपने को प्रगतिशील कहने वाले बुद्विजीवी विवेकानन्द की ऐतिहासिक भूमिका को समझने का तनिक भी प्रयास नहीं करते। वे विवेकानन्द को सिर्फ इसलिए प्रतिक्रियावादी कह देते हैं कि उन्हांेने मूर्ति-पूजा का समर्थन किया। सवाल यह है कि अगर राजा राममोहन राय, दयानन्द और केशवचन्द्र सेन के प्रचार से मूर्ति-पूजा दूर नहीं हुई तो क्या एक विवेकानन्द के विरोध से दूर हो जाती? ये तथाकथित बुद्विजीवी कभी नहीं समझ