है। संघर्ष आरम्भ हो गया है-हमारे एवं ब्रह्यसमाज के बीच नहीं, क्योंकि वे पहले ही से निष्प्राण हो गए हैं, बल्कि इससे भी अधिक कठिन, गम्भीर एवं भीषण संघर्ष।’’ (सप्तम खंड, पृष्ठ 383)
ब्रह्यसमाजी और उन सरीखे दूसरे पढ़े-लिखे लोगों ने अपने राष्ट्रीय गौरव को भुलाकर अंगे्रज़ के गौरव को ओढ़ लिया था। वे अपने अतीत, इतिहास और परम्परा को ताक पर रखकर ‘विशुद्व आधुनिक बनते जा रहे थे। अंगे्रज़ जिस चीज़ की प्रशंसा करे वही उत्कृष्ट और सत्य थी।
है। संघर्ष आरम्भ हो गया है-हमारे एवं ब्रह्यसमाज के बीच नहीं, क्योंकि वे पहले ही से निष्प्राण हो गए हैं, बल्कि इससे भी अधिक कठिन, गम्भीर एवं भीषण संघर्ष।’’ (सप्तम खंड, पृष्ठ 383)
ब्रह्यसमाजी और उन सरीखे दूसरे पढ़े-लिखे लोगों ने अपने राष्ट्रीय गौरव को भुलाकर अंगे्रज़ के गौरव को ओढ़ लिया था। वे अपने अतीत, इतिहास और परम्परा को ताक पर रखकर ‘विशुद्व आधुनिक बनते जा रहे थे। अंगे्रज़ जिस चीज़ की प्रशंसा करे वही उत्कृष्ट और सत्य थी।