मूर्ति-पूजक रामकृष्ण परमहंस ने पश्चिम के इस अन्धे अनुकरण की बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोका। विवेकानन्द ने अपने ‘वर्तमान भारत’ लेख में लिखा है:
‘‘एक कम बुुद्विवाला लड़का श्री रामकृष्ण देव के सामने सदा शास्त्रों की निंदा किया करता था। उसने एक बार गीता की बड़ी प्रशंसा की। इस पर श्री रामकृष्ण देव ने कहा, ‘किसी अंगे्रज़ विद्वान ने गीता की प्रशंसा की होगी। इसीलिए यह भी उसकी प्रशंसा कर रहा है।’ ’’ (नवम खंड, पृष्ठ 226)
प्रश्न मूर्ति-पूजा का नहीं,
मूर्ति-पूजक रामकृष्ण परमहंस ने पश्चिम के इस अन्धे अनुकरण की बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोका। विवेकानन्द ने अपने ‘वर्तमान भारत’ लेख में लिखा है:
‘‘एक कम बुुद्विवाला लड़का श्री रामकृष्ण देव के सामने सदा शास्त्रों की निंदा किया करता था। उसने एक बार गीता की बड़ी प्रशंसा की। इस पर श्री रामकृष्ण देव ने कहा, ‘किसी अंगे्रज़ विद्वान ने गीता की प्रशंसा की होगी। इसीलिए यह भी उसकी प्रशंसा कर रहा है।’ ’’ (नवम खंड, पृष्ठ 226)
प्रश्न मूर्ति-पूजा का नहीं,