प्रश्न राष्ट्रीय गौरव, राष्ट्रीय संस्कृति और परम्परा की रक्षा का था। जो सिर्फ मूर्ति-पूजा की बात करते हैं, वह इस प्रश्न के प्रधान तत्त्व को समझने में असमर्थ हैं। अपने इतिहास के बारे में उनका ज्ञान उतना ही है जितना
192 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
अंगे्रज़ उन्हें पढ़ा गया है। वे यह नहीं जानते कि विदेशी मुस्लिम शासकों ने भी अपने को ‘बुतशिकन’ कहकर ‘बुतपरस्त’ काफिरों को अंधविश्वास से निकालने के नाम पर हमारे राष्ट्रीय गौरव,
प्रश्न राष्ट्रीय गौरव, राष्ट्रीय संस्कृति और परम्परा की रक्षा का था। जो सिर्फ मूर्ति-पूजा की बात करते हैं, वह इस प्रश्न के प्रधान तत्त्व को समझने में असमर्थ हैं। अपने इतिहास के बारे में उनका ज्ञान उतना ही है जितना
192 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
अंगे्रज़ उन्हें पढ़ा गया है। वे यह नहीं जानते कि विदेशी मुस्लिम शासकों ने भी अपने को ‘बुतशिकन’ कहकर ‘बुतपरस्त’ काफिरों को अंधविश्वास से निकालने के नाम पर हमारे राष्ट्रीय गौरव,