मानते थे। ‘विलायती’ शब्द उन्हीें के लिए प्रयोग होता था। ये ‘विलायती’ तत्त्व हमारे राष्ट्रीय
193 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
जीवन का अंग नहीं बन सके, सदा विदेशी ही बने रहे।
हमारे अपने देश में भी ऐसे तत्त्व थे, जिन्होंने दरबारद़ारी को अपना पेशा बना रखा था। उनमें कायस्थ और कश्मीरी ब्राह्यण विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उनके लिए विद्याा राजदरबार में रसोई का साधनमात्र थी और इसके सिवा कोई प्रयोजन नहीं था। मुसलमानों के आने
मानते थे। ‘विलायती’ शब्द उन्हीें के लिए प्रयोग होता था। ये ‘विलायती’ तत्त्व हमारे राष्ट्रीय
193 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
जीवन का अंग नहीं बन सके, सदा विदेशी ही बने रहे।
हमारे अपने देश में भी ऐसे तत्त्व थे, जिन्होंने दरबारद़ारी को अपना पेशा बना रखा था। उनमें कायस्थ और कश्मीरी ब्राह्यण विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उनके लिए विद्याा राजदरबार में रसोई का साधनमात्र थी और इसके सिवा कोई प्रयोजन नहीं था। मुसलमानों के आने