से पहले वे संस्कृत सीखकर राजाओं की दरबारदारी करते थे, जब मुसलमान आए तो उन्होंने फारसी सीखकर मुसलमानों की दरबारी की और फिर जब अंगे्रज़ आए तो वे चट अंगे्रज़ी सीखकर उनकी दरबारदारी करने लगे। शासक वर्ग की भाषा और संस्कृति ही उनकी भाषा और संस्कृति थी। भारत के अतीत, इतिहास और परम्परा से उन्होंने अपना संबंध विच्छेद कर लिया था। जनसाधारण के शोषण और दमन में किसी भी शासक वर्ग का सहयोगी बन जाना और चापलूसी करना उनके जीवन का मूलमंत्र था और अब भी है।
से पहले वे संस्कृत सीखकर राजाओं की दरबारदारी करते थे, जब मुसलमान आए तो उन्होंने फारसी सीखकर मुसलमानों की दरबारी की और फिर जब अंगे्रज़ आए तो वे चट अंगे्रज़ी सीखकर उनकी दरबारदारी करने लगे। शासक वर्ग की भाषा और संस्कृति ही उनकी भाषा और संस्कृति थी। भारत के अतीत, इतिहास और परम्परा से उन्होंने अपना संबंध विच्छेद कर लिया था। जनसाधारण के शोषण और दमन में किसी भी शासक वर्ग का सहयोगी बन जाना और चापलूसी करना उनके जीवन का मूलमंत्र था और अब भी है।