भीतर-बाहर से साहब बने बैठे हो तथा यह कहकर चिल्लाते घूमते हो-‘हम लोग नर-पशु हैं, हे यूरोपवासियों, हमारा उद्वार करो’ और यह कहकर धूम मचाते हो कि ईसू आकर भारत में बैठे हैं। ओ बंधु ! यहां ईसू भी नहीं आए, जिहोवा भी नहीं आए और न आएंगे ही। वे इस समय अपने घर सम्भाल रहे हैं, हमारे देश में आने का उन्हें अवसर नहीं है। इस देश में वही बूढ़े शिवजी बैठे हैं, यहां काली माई बलि खाति हैं और बंसीधारी बंसी बजाते हैं।...यह जो हिमालय पहाड़ है,
भीतर-बाहर से साहब बने बैठे हो तथा यह कहकर चिल्लाते घूमते हो-‘हम लोग नर-पशु हैं, हे यूरोपवासियों, हमारा उद्वार करो’ और यह कहकर धूम मचाते हो कि ईसू आकर भारत में बैठे हैं। ओ बंधु ! यहां ईसू भी नहीं आए, जिहोवा भी नहीं आए और न आएंगे ही। वे इस समय अपने घर सम्भाल रहे हैं, हमारे देश में आने का उन्हें अवसर नहीं है। इस देश में वही बूढ़े शिवजी बैठे हैं, यहां काली माई बलि खाति हैं और बंसीधारी बंसी बजाते हैं।...यह जो हिमालय पहाड़ है,