वह इधर-उधर के विभिन्न स्न्न्ाोतों से वैसे ही एकत्रित किए हुए अपरिपक्व, विश्रृंखल बेमेल भावांे की असंतुलित राशि मात्र है। वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता, उसका सिर हमेशा चक्कर खाया करता है। वह जो कुछ करता है, क्या आप उसका कारण जानना चाहते
196 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
हैं ? अंगे्रज़ों से थोड़ी शाबासी पा जाना ही उसके सब कार्यों का मूल प्रेरक है, वह हमारी कितनी ही सामाजिक प्रथाओं के विरूद्व तीव्र आक्रमण करता है, इसका
वह इधर-उधर के विभिन्न स्न्न्ाोतों से वैसे ही एकत्रित किए हुए अपरिपक्व, विश्रृंखल बेमेल भावांे की असंतुलित राशि मात्र है। वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता, उसका सिर हमेशा चक्कर खाया करता है। वह जो कुछ करता है, क्या आप उसका कारण जानना चाहते
196 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
हैं ? अंगे्रज़ों से थोड़ी शाबासी पा जाना ही उसके सब कार्यों का मूल प्रेरक है, वह हमारी कितनी ही सामाजिक प्रथाओं के विरूद्व तीव्र आक्रमण करता है, इसका