था और बाद में सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी उनके साथ आ मिले थे, जिन्हें विदेशी शासकों ने सिविल सर्विस से अकारण निकाल दिया था। बिपिनचन्द्र पाल का कहना है कि सुरेन्द्रनाथ के जोशीले और देशभक्ति-भरे भाषणों ने विद्यार्थी आन्दोलन में नये प्राण फूंक दिए थे।
उन्नीसवीं सदी के उत्तराद्र्व में जो राष्ट्रय चेतना दिन-दिन सबल होती जा रही थी, वह वास्तव में उस समय के साहित्य में व्यक्त हुई। बंकिमचन्द्र के ‘आनन्द मठ’ आदि ऐतिहासिक उपन्यास राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत थे और उन्होंने अपने
था और बाद में सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी उनके साथ आ मिले थे, जिन्हें विदेशी शासकों ने सिविल सर्विस से अकारण निकाल दिया था। बिपिनचन्द्र पाल का कहना है कि सुरेन्द्रनाथ के जोशीले और देशभक्ति-भरे भाषणों ने विद्यार्थी आन्दोलन में नये प्राण फूंक दिए थे।
उन्नीसवीं सदी के उत्तराद्र्व में जो राष्ट्रय चेतना दिन-दिन सबल होती जा रही थी, वह वास्तव में उस समय के साहित्य में व्यक्त हुई। बंकिमचन्द्र के ‘आनन्द मठ’ आदि ऐतिहासिक उपन्यास राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत थे और उन्होंने अपने