दिन-दिन सबल होती जा रही राष्ट्रीय चेतना का दबाव सुधारवादी आन्दोलनों पर भी पड़ा, पड़ना अनिवार्य था। इसी दबाव के कारण विशुद्व आधुनिकता से काम न चलते देख, केशवचन्द्र अपने ब्रह्यसमाज को मध्यकाल तक ले जाने के लिए बाध्य हुए। इन्हीं परिस्थितियों में 1876 के आस-पास साम्राज्यवादी प्रचार का नया रूप थियोसाफिस्ट आन्दोलन आया। थियोसाफी वाले जिस देश में भी जाते थे उसी देश के रूढ़िवादी धर्म में अपने को ढाल लेते थे। हमारे देश में भी उन्होंने यही ढंग अपनाकर अवतारवाद,
दिन-दिन सबल होती जा रही राष्ट्रीय चेतना का दबाव सुधारवादी आन्दोलनों पर भी पड़ा, पड़ना अनिवार्य था। इसी दबाव के कारण विशुद्व आधुनिकता से काम न चलते देख, केशवचन्द्र अपने ब्रह्यसमाज को मध्यकाल तक ले जाने के लिए बाध्य हुए। इन्हीं परिस्थितियों में 1876 के आस-पास साम्राज्यवादी प्रचार का नया रूप थियोसाफिस्ट आन्दोलन आया। थियोसाफी वाले जिस देश में भी जाते थे उसी देश के रूढ़िवादी धर्म में अपने को ढाल लेते थे। हमारे देश में भी उन्होंने यही ढंग अपनाकर अवतारवाद,