अगर रतन सब रूपये दे दे तो बिगड़ी बात बन जाय। आशा का यही एक आधार रह गया था।
जब वह खाना खाकर लेटा, तो जालपा ने कहा, 'आज किस सोच में पड़े हो?'
रमानाथ-'सोच किस बात का- क्या मैं उदास हूं?'
जालपा-'हां, किसी चिंता में पड़े हुए हो, मगर मुझसे बताते नहीं हो!'
रमानाथ-'ऐसी कोई बात होती तो तुमसे छिपाता?'
जालपा-'वाह, तुम अपने दिल की बात मुझसे क्यों कहोगे? ऋषियों की आज्ञा नहीं है।'
रमानाथ-'मैं उन ऋषियों के भक्तों में नहीं हूं।'
अगर रतन सब रूपये दे दे तो बिगड़ी बात बन जाय। आशा का यही एक आधार रह गया था।
जब वह खाना खाकर लेटा, तो जालपा ने कहा, 'आज किस सोच में पड़े हो?'
रमानाथ-'सोच किस बात का- क्या मैं उदास हूं?'
जालपा-'हां, किसी चिंता में पड़े हुए हो, मगर मुझसे बताते नहीं हो!'
रमानाथ-'ऐसी कोई बात होती तो तुमसे छिपाता?'
जालपा-'वाह, तुम अपने दिल की बात मुझसे क्यों कहोगे? ऋषियों की आज्ञा नहीं है।'
रमानाथ-'मैं उन ऋषियों के भक्तों में नहीं हूं।'