कि केवल बुद्धि ही में परम आनन्द भोगने की क्षमता है। मनुष्य में सर्वपरधान बुद्धि ही है। पंचभूतों का बना हुआ शरीर तो जड़ है, जीवात्मा अधिक सूक्ष्म है, पर वह भी भौतिक है, केवल बुद्धि ही निर्विकार और अखण्ड है। जब वह भवनरूपी शरीर से परस्थान करके-जो अकस्मात निर्जन और शून्य हो गया हो-आत्मा के रमणीक उद्यान में विचरण करती हुई ईश्वर में समाविष्ट हो जाती है तो वह पूर्व निश्चित मृत्यु या पुनर्जन्म के आनन्द उठाती है, क्योंकि जीवन
कि केवल बुद्धि ही में परम आनन्द भोगने की क्षमता है। मनुष्य में सर्वपरधान बुद्धि ही है। पंचभूतों का बना हुआ शरीर तो जड़ है, जीवात्मा अधिक सूक्ष्म है, पर वह भी भौतिक है, केवल बुद्धि ही निर्विकार और अखण्ड है। जब वह भवनरूपी शरीर से परस्थान करके-जो अकस्मात निर्जन और शून्य हो गया हो-आत्मा के रमणीक उद्यान में विचरण करती हुई ईश्वर में समाविष्ट हो जाती है तो वह पूर्व निश्चित मृत्यु या पुनर्जन्म के आनन्द उठाती है, क्योंकि जीवन