यदि आनन्द और शान्ति मेरे हाथों की पहुंच में भी आ जाय तो मुझमें उसके लेने की शक्ति न होगी।'
पापनाशी ने उस स्नेहमय करुणा से देखकर कहा-'पिरय भगिनी ! धैर्य और साहस ही से तेरा उद्घार होगा। तेरी सुखशान्ति का उज्ज्वल और निर्मल परकाश इस भांति निकल रहा है जैसे सागर और वन से भाप निकलती है।'
यह बातें करते हुए दोनों घर के समीप आ पहुंचे। सरो और सनोवर के वृक्ष जो 'परियों के कुंज' को घेरे हुए थे, दीवार के ऊपर सिर उठाये परभातसमीर
यदि आनन्द और शान्ति मेरे हाथों की पहुंच में भी आ जाय तो मुझमें उसके लेने की शक्ति न होगी।'
पापनाशी ने उस स्नेहमय करुणा से देखकर कहा-'पिरय भगिनी ! धैर्य और साहस ही से तेरा उद्घार होगा। तेरी सुखशान्ति का उज्ज्वल और निर्मल परकाश इस भांति निकल रहा है जैसे सागर और वन से भाप निकलती है।'
यह बातें करते हुए दोनों घर के समीप आ पहुंचे। सरो और सनोवर के वृक्ष जो 'परियों के कुंज' को घेरे हुए थे, दीवार के ऊपर सिर उठाये परभातसमीर