साथ नहीं आया थां वह अपनी मरहठा सेना लिऐ अपने स्थान पर डटा रहा। सन् 1667 ई. में शाहजहां मुगल राज्य के सिंहासन पर बैठा। शाहजहां की उस सेनापति से जो दक्षिण के मैदान में लड़ रहा था कुछ रंजिश थी। उसने तुरन्त ही खांजहां लोदी को दक्षिण के युद्व से वापस बुला लिया। जब खांजहां लोदी दरबार में आया तो उसे कुछ बेइमानी के लक्षण दिखाई पड़े। वह झट भाग कर दक्षिण चला गया और निजामशाही (अहमदनगर) राज्य की शरण में रहने लगा। शाहजहां ने इसके पीछे
साथ नहीं आया थां वह अपनी मरहठा सेना लिऐ अपने स्थान पर डटा रहा। सन् 1667 ई. में शाहजहां मुगल राज्य के सिंहासन पर बैठा। शाहजहां की उस सेनापति से जो दक्षिण के मैदान में लड़ रहा था कुछ रंजिश थी। उसने तुरन्त ही खांजहां लोदी को दक्षिण के युद्व से वापस बुला लिया। जब खांजहां लोदी दरबार में आया तो उसे कुछ बेइमानी के लक्षण दिखाई पड़े। वह झट भाग कर दक्षिण चला गया और निजामशाही (अहमदनगर) राज्य की शरण में रहने लगा। शाहजहां ने इसके पीछे