लिया और आरम्भ ही से ऐसी मित्रता की कि अन्त तक वे सब शिवाजी के सहायक बने रहे।
जागीर के प्रबन्ध में भी दादाजी कोंड़देव ने शिवाजी को पूर्ण शिक्षित किया था जिसके कारण वे सर्वप्रिय हो रहे थे। शिवाजी के हृदय में स्वतन्त्रता की अभिलाषा पहले ही से थी जो अपना रंग दिखाने लगी। कभी कभी शिवाजी दिन भर गायब रहते थे और ऐसे लोगों से मिलते जुलते रहते थे जो
छत्रपति शिवाजी 41
किसी राज्य के अधीन नहीं थे और न किसी कानून के पाबन्द थे।
लिया और आरम्भ ही से ऐसी मित्रता की कि अन्त तक वे सब शिवाजी के सहायक बने रहे।
जागीर के प्रबन्ध में भी दादाजी कोंड़देव ने शिवाजी को पूर्ण शिक्षित किया था जिसके कारण वे सर्वप्रिय हो रहे थे। शिवाजी के हृदय में स्वतन्त्रता की अभिलाषा पहले ही से थी जो अपना रंग दिखाने लगी। कभी कभी शिवाजी दिन भर गायब रहते थे और ऐसे लोगों से मिलते जुलते रहते थे जो
छत्रपति शिवाजी 41
किसी राज्य के अधीन नहीं थे और न किसी कानून के पाबन्द थे।