छत्रपति शिवाजी - Chhatrapati Shivaji

रात दिन जंगलों में घूमते फिरते। यहां तक कि कुछ लोग यह ख्याल करने लगे कि शिवाजी डाकुओं के साथ मिल गये। ये सब शिकायतें दादाजी कोंड़देव के पास तक पहुंची। इसकी रोक के वास्ते जागीर का बहुत बड़ा हिस्सा शिवाजी को सौंप दिया गया। इससे इतना प्रभाव पड़ा कि दिन भर वह कहीं बाहर न जाने लगे परन्तु जो चीज उनकी प्रकृति में मिल गई हो वह कैसे दूर की जा सकती थी? शाहजी की जागीर में कोई दुर्ग नहीं था इसलिए आत्मरक्षा और धर्मरक्षा के लिए किसी दुर्ग


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रात दिन जंगलों में घूमते फिरते। यहां तक कि कुछ लोग यह ख्याल करने लगे कि शिवाजी डाकुओं के साथ मिल गये। ये सब शिकायतें दादाजी कोंड़देव के पास तक पहुंची। इसकी रोक के वास्ते जागीर का बहुत बड़ा हिस्सा शिवाजी को सौंप दिया गया। इससे इतना प्रभाव पड़ा कि दिन भर वह कहीं बाहर न जाने लगे परन्तु जो चीज उनकी प्रकृति में मिल गई हो वह कैसे दूर की जा सकती थी? शाहजी की जागीर में कोई दुर्ग नहीं था इसलिए आत्मरक्षा और धर्मरक्षा के लिए किसी दुर्ग


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