इधर शाहजी ने दादाजी कोंड़देव के पास पत्र लिखकर अप्रसन्नता प्रकट की और कहला भेजा कि वे भविष्य में शिवाजी को ऐसा कार्य करने से रोकें। इस समाचार के सुनते ही शिवाजी को बड़ी चिन्ता हुई। एक ओर थी पिता की आज्ञा और दूसरी ओर थी धर्म और राज्य प्राप्त करने की प्रबल इच्छा। उस समय शिवाजी के हृदय में तरह तरह के विचार उठ रहे थे अद्भूत दशा में उसका चित्त गोते लगा रहा था।
छत्रपति शिवाजी 43
अन्त में उसने अपनी प्यारी स्त्री से सम्मति
इधर शाहजी ने दादाजी कोंड़देव के पास पत्र लिखकर अप्रसन्नता प्रकट की और कहला भेजा कि वे भविष्य में शिवाजी को ऐसा कार्य करने से रोकें। इस समाचार के सुनते ही शिवाजी को बड़ी चिन्ता हुई। एक ओर थी पिता की आज्ञा और दूसरी ओर थी धर्म और राज्य प्राप्त करने की प्रबल इच्छा। उस समय शिवाजी के हृदय में तरह तरह के विचार उठ रहे थे अद्भूत दशा में उसका चित्त गोते लगा रहा था।
छत्रपति शिवाजी 43
अन्त में उसने अपनी प्यारी स्त्री से सम्मति