शिवाजी के हृदय में नवीन उत्साह का संचार कर दिया। बस फिर क्या था, खुलेआम कार्य आरम्भ कर दिया गया। जिसका अधिक भय था उसने भी मरते मरते शिवाजी को कर्तव्य पूरा
44 छत्रपति शिवाजी
करने की आज्ञा दे दी। दादाजी की आज्ञा उसके लिए ईश्वर की आज्ञा थी जिसका पूरा करना शिवाजी ने अपना परम कर्तव्य समझा।
दादाजी के मरने के बाद शिवाजी ने अपने पिता की तरफ से जागीर का प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया जब शिवाजी के पिता ने शेष मालगुजारी का हिसाब
शिवाजी के हृदय में नवीन उत्साह का संचार कर दिया। बस फिर क्या था, खुलेआम कार्य आरम्भ कर दिया गया। जिसका अधिक भय था उसने भी मरते मरते शिवाजी को कर्तव्य पूरा
44 छत्रपति शिवाजी
करने की आज्ञा दे दी। दादाजी की आज्ञा उसके लिए ईश्वर की आज्ञा थी जिसका पूरा करना शिवाजी ने अपना परम कर्तव्य समझा।
दादाजी के मरने के बाद शिवाजी ने अपने पिता की तरफ से जागीर का प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया जब शिवाजी के पिता ने शेष मालगुजारी का हिसाब