उठाया। ’बाजीराव पालकर’ भी ’बारी’ के अध्यक्ष को अपने आधीन न कर सका। इस पिछली लड़ाई में दोनों ओर के अध्यक्ष मारे गये परन्तु सेना ने हार न मानी।
हा शोक! कितने योद्वा और वीर अपने भाइयों के हाथों मोर गये। ऐसा कोई नहीं था जो समझता कि अपने भाइयों का विध्वंस करना (भाई भी कैसे जो धर्म युद्व करने तथा निर्दयी शत्रुओं के हाथों से अपनी भूमि छुड़ाना चाहते थे) महापाप है। दुर्भाग्य ! भारतवर्ष के इसी भीतरी संग्राम ने ’तरावड़ी’ के मैदान
उठाया। ’बाजीराव पालकर’ भी ’बारी’ के अध्यक्ष को अपने आधीन न कर सका। इस पिछली लड़ाई में दोनों ओर के अध्यक्ष मारे गये परन्तु सेना ने हार न मानी।
हा शोक! कितने योद्वा और वीर अपने भाइयों के हाथों मोर गये। ऐसा कोई नहीं था जो समझता कि अपने भाइयों का विध्वंस करना (भाई भी कैसे जो धर्म युद्व करने तथा निर्दयी शत्रुओं के हाथों से अपनी भूमि छुड़ाना चाहते थे) महापाप है। दुर्भाग्य ! भारतवर्ष के इसी भीतरी संग्राम ने ’तरावड़ी’ के मैदान