से बड़ी नम्रता के साथ मिला यहां तक की उनको सम्राट् की सेना में एक उच्च पद पर अधिकारी बनाया परन्तु वीर ’निर्मला’ ने यह पद स्वीकार न किया। यद्यपि औरंगजेब समझता था कि मरहठों को अपने अधीन करना कुछ बड़ी बात नहीं है परन्तु शायस्ता खां को इस लड़ाई से पता लग गया कि मरहठा लोगों को अधीन करना कुछ खेल नहीं है। अतएव वह लड़ाई से बचाव करने लगा। उधर औरंगजेब की तरफ से जोधपुर के महाराजा यशवन्तसिंह अपनी सेना के साथ तुरन्त शायस्ता खां की सहायता
से बड़ी नम्रता के साथ मिला यहां तक की उनको सम्राट् की सेना में एक उच्च पद पर अधिकारी बनाया परन्तु वीर ’निर्मला’ ने यह पद स्वीकार न किया। यद्यपि औरंगजेब समझता था कि मरहठों को अपने अधीन करना कुछ बड़ी बात नहीं है परन्तु शायस्ता खां को इस लड़ाई से पता लग गया कि मरहठा लोगों को अधीन करना कुछ खेल नहीं है। अतएव वह लड़ाई से बचाव करने लगा। उधर औरंगजेब की तरफ से जोधपुर के महाराजा यशवन्तसिंह अपनी सेना के साथ तुरन्त शायस्ता खां की सहायता