उचित न समझता था। परन्तु यह एक विशेष अवसर था इस अवसर की विशेषता इसी से प्रकट है कि औरंगजेब ने भी उस साधुपने को थोड़ी देर के लिए तिलांजति दे दी।
बादशाह ने हिजरी सन् 1076 की तारीख ज़ीकाद तदनुसार 1666 ई. में एक बड़ा भारी दरबार किया गया। स्वयं सम्राट् बड़े बडे़ अमूल्य मोती तथा अप्राप्य मणियों से बने हुए आभूषण धारण करके शाहजहां की गद्दी पर विराजमान हुआ मानो इस तिथि को ही सर्वप्रथम औरंगजेब पिता की गद्दी पर बैठा। अब तक तो औरंगजेब अपने सम्पूर्ण शत्रुओं को आधीन कर चुका था,
उचित न समझता था। परन्तु यह एक विशेष अवसर था इस अवसर की विशेषता इसी से प्रकट है कि औरंगजेब ने भी उस साधुपने को थोड़ी देर के लिए तिलांजति दे दी।
बादशाह ने हिजरी सन् 1076 की तारीख ज़ीकाद तदनुसार 1666 ई. में एक बड़ा भारी दरबार किया गया। स्वयं सम्राट् बड़े बडे़ अमूल्य मोती तथा अप्राप्य मणियों से बने हुए आभूषण धारण करके शाहजहां की गद्दी पर विराजमान हुआ मानो इस तिथि को ही सर्वप्रथम औरंगजेब पिता की गद्दी पर बैठा। अब तक तो औरंगजेब अपने सम्पूर्ण शत्रुओं को आधीन कर चुका था,