से बाहर निकल गये। दिल्ली से बाहर घोड़े पर सवार हो दूसरे दिन मथुरा पहुंचे। यहां पर इनका एक विश्वासपात्र मित्र नेताजी और कई एक ब्राह्यण शिवाजी की राह देख रहे थे। मथुरा पहुंच कर शिवाजी ने दाढ़ी मूंछ मुंड़ा दी और शरीर पर विभूति रमा एक साधु का भेष बना लिया। रूपया पैसा और हीरा मोती, ये सब एक खोखली छड़ी में रखकर रातों रात प्रयाग पहुंचे । प्रयाग में उन्होंने अपने बेटे सम्भाजी को जो उस समय बालक था एक दक्षिणी ब्राह्यण को सौंप दिया
से बाहर निकल गये। दिल्ली से बाहर घोड़े पर सवार हो दूसरे दिन मथुरा पहुंचे। यहां पर इनका एक विश्वासपात्र मित्र नेताजी और कई एक ब्राह्यण शिवाजी की राह देख रहे थे। मथुरा पहुंच कर शिवाजी ने दाढ़ी मूंछ मुंड़ा दी और शरीर पर विभूति रमा एक साधु का भेष बना लिया। रूपया पैसा और हीरा मोती, ये सब एक खोखली छड़ी में रखकर रातों रात प्रयाग पहुंचे । प्रयाग में उन्होंने अपने बेटे सम्भाजी को जो उस समय बालक था एक दक्षिणी ब्राह्यण को सौंप दिया