और कठिन चेतावनी दे दी कि जब तक मेरे हाथ की लिखी चिट्ठी न आवे तुम इसको मत भेजना। इस प्रकार अपना बोझ हलका करके शिवाजी उसी साधु के वेश में काशी की ओर चल दिये। जिस समय शिवाजी प्रयाग से रवाना हुए उस समय प्रयाग से एक गोल (झुण्ड) वैरागियों गुसाइयों और साधुओं का काशी जा रहा था। इन्हीं के साथ शिवाजी भी चल पड़े। रात में यह झुण्ड बढ़ता जा रहा था कि एक स्थान पर एक मुसलमान सेना अध्यक्ष ने उन्हें पकड़ लिया और तलाशी की आज्ञा दी। एक दिन
और कठिन चेतावनी दे दी कि जब तक मेरे हाथ की लिखी चिट्ठी न आवे तुम इसको मत भेजना। इस प्रकार अपना बोझ हलका करके शिवाजी उसी साधु के वेश में काशी की ओर चल दिये। जिस समय शिवाजी प्रयाग से रवाना हुए उस समय प्रयाग से एक गोल (झुण्ड) वैरागियों गुसाइयों और साधुओं का काशी जा रहा था। इन्हीं के साथ शिवाजी भी चल पड़े। रात में यह झुण्ड बढ़ता जा रहा था कि एक स्थान पर एक मुसलमान सेना अध्यक्ष ने उन्हें पकड़ लिया और तलाशी की आज्ञा दी। एक दिन