अपने खेत छोड़कर तानाजी के चारों ओर जमा हो गये थे। न तो उनके पास में वस्त्र थे न अस्त्र थे। किन्तु उनकी लाठियां ही उनके लिए शस्त्र थी। जब गांव से निकले तो शकुन बहुत बुरे दिखाई देने गले। वृद्व जी को संदेह हो गया, इसलिए तानाजी से कहने लगा कि शकुन तो ठीक नहीं है। लौट चलो, परन्तु वीर तानाजी ने कहा कि चाचा जी! मैं शकुन वकुन कुछ नहीं जानता, मेरा राजा भाग्य का बड़ा धनी है। उसक काम में कोई मन्द शकुन हो ही नहीं सकता है। आप पीछे लौटने का नाम न लें, सीधे मार्ग पर आ जायें।
अपने खेत छोड़कर तानाजी के चारों ओर जमा हो गये थे। न तो उनके पास में वस्त्र थे न अस्त्र थे। किन्तु उनकी लाठियां ही उनके लिए शस्त्र थी। जब गांव से निकले तो शकुन बहुत बुरे दिखाई देने गले। वृद्व जी को संदेह हो गया, इसलिए तानाजी से कहने लगा कि शकुन तो ठीक नहीं है। लौट चलो, परन्तु वीर तानाजी ने कहा कि चाचा जी! मैं शकुन वकुन कुछ नहीं जानता, मेरा राजा भाग्य का बड़ा धनी है। उसक काम में कोई मन्द शकुन हो ही नहीं सकता है। आप पीछे लौटने का नाम न लें, सीधे मार्ग पर आ जायें।