स्वीकार कर ली थी और आदिलशाह की पुत्री ’बादशाह बीवी’ को औरंगजेब के पुत्र के साथ ब्याह कर देने की प्रतिज्ञा कर ली थी। इसलिए अब्दुलकरीम इस समय विचित्र शिकंजे में फंसा हुआ था। भीतर से तो वह मुग़लों का शत्रु था परन्तु बाहरी दिखावे में दिलेरखां के कारण उससे बिगाड़ करने का साहस न होता था। उधर गोलकुण्डा में सन् 1670 ई. में कुतुबशाह के मर जाने के कारण प्रबन्ध मंे गड़बड़ी मच गई थी। उसका दामाद’ अबूहुसेन’ गद्दी पर बैठा था परन्तु वास्तविक
स्वीकार कर ली थी और आदिलशाह की पुत्री ’बादशाह बीवी’ को औरंगजेब के पुत्र के साथ ब्याह कर देने की प्रतिज्ञा कर ली थी। इसलिए अब्दुलकरीम इस समय विचित्र शिकंजे में फंसा हुआ था। भीतर से तो वह मुग़लों का शत्रु था परन्तु बाहरी दिखावे में दिलेरखां के कारण उससे बिगाड़ करने का साहस न होता था। उधर गोलकुण्डा में सन् 1670 ई. में कुतुबशाह के मर जाने के कारण प्रबन्ध मंे गड़बड़ी मच गई थी। उसका दामाद’ अबूहुसेन’ गद्दी पर बैठा था परन्तु वास्तविक