आज ’रघुपन्त’ के पत्र से ज्ञात हुआ कि तुम उदास हो और अपने शरीर की भी परवाह नहीं करते। तुम्हारी सेना सुस्त पड़ गई है परन्तु तुम्हंे कुछ परवाह नहीं। लोगों को सन्देह है कि तुम कहीं वैरागी न बना जाओ। मैं हैरान हूं कि तुम अपने पिता के सच्चे दृष्टान्त को क्यों भूल गये? जिरकाल तक उनके सााि रहे और उनकी संगति से लाभ उठाया। यह ध्यान देने की बात है कि पिताजी ने कैसी वीरता व गम्भीरता से कठिनाइयों का सामना करते हुए बड़े बड़े कार्य किये,
आज ’रघुपन्त’ के पत्र से ज्ञात हुआ कि तुम उदास हो और अपने शरीर की भी परवाह नहीं करते। तुम्हारी सेना सुस्त पड़ गई है परन्तु तुम्हंे कुछ परवाह नहीं। लोगों को सन्देह है कि तुम कहीं वैरागी न बना जाओ। मैं हैरान हूं कि तुम अपने पिता के सच्चे दृष्टान्त को क्यों भूल गये? जिरकाल तक उनके सााि रहे और उनकी संगति से लाभ उठाया। यह ध्यान देने की बात है कि पिताजी ने कैसी वीरता व गम्भीरता से कठिनाइयों का सामना करते हुए बड़े बड़े कार्य किये,