मिला था। शत्रुओं की स्त्रियां जब कभी शिवाजी को मिलती थी तो उनके साथ शुद्व हृदय से पेश आते थे और आदर सहित उनको अपने घर भिजवा देते थे। शिवाजी कभी दूसरे मत से विरोध न करते थे। खानखां ने अपनी पुस्तक के दूसरे भाग पृष्ठ संख्या 110 में लिखा है कि शिवाजी का यह नियम था कि कोई मस्जिदों को हानि न पहुंचावे, औरतों को न छेड़े, और मुसलमानों के धर्म की हंसी न उड़ावे। शिवाजी को जब कभी कोई ’कुरान’ की पुस्तक मिल जाती थी तो किसी मुसलमान को
मिला था। शत्रुओं की स्त्रियां जब कभी शिवाजी को मिलती थी तो उनके साथ शुद्व हृदय से पेश आते थे और आदर सहित उनको अपने घर भिजवा देते थे। शिवाजी कभी दूसरे मत से विरोध न करते थे। खानखां ने अपनी पुस्तक के दूसरे भाग पृष्ठ संख्या 110 में लिखा है कि शिवाजी का यह नियम था कि कोई मस्जिदों को हानि न पहुंचावे, औरतों को न छेड़े, और मुसलमानों के धर्म की हंसी न उड़ावे। शिवाजी को जब कभी कोई ’कुरान’ की पुस्तक मिल जाती थी तो किसी मुसलमान को