दे देते थे। औरतों को अत्यन्त आदर की दृष्टि से देखते थे और उन्हें उनके रिश्तेदारों
छत्रपति शिवाजी 121
की शरण में पहुंचा देते थें लूट खसोट में गराबों और काश्तकारों की रक्षा करते थे। गो-ब्राह्यणों के लिए तो वे देवता स्वरूप थे। यद्यपि बहुत से लोग उनको लाालजी बताते हैं परन्तु उनके जीवन के कामों से विदित होता है कि वे जुल्म और अन्याय से धन कमा कर इकट्ठा करना अत्यन्त नीच काम समझते थे। शत्रु के धन को और राज्य को लूटने को वह अच्छा समझते थें एक बार दिलेर खां,
दे देते थे। औरतों को अत्यन्त आदर की दृष्टि से देखते थे और उन्हें उनके रिश्तेदारों
छत्रपति शिवाजी 121
की शरण में पहुंचा देते थें लूट खसोट में गराबों और काश्तकारों की रक्षा करते थे। गो-ब्राह्यणों के लिए तो वे देवता स्वरूप थे। यद्यपि बहुत से लोग उनको लाालजी बताते हैं परन्तु उनके जीवन के कामों से विदित होता है कि वे जुल्म और अन्याय से धन कमा कर इकट्ठा करना अत्यन्त नीच काम समझते थे। शत्रु के धन को और राज्य को लूटने को वह अच्छा समझते थें एक बार दिलेर खां,