‘गोंद्या, तनिक देखो तो हमारे दादा की देह! जैसे सोने का टुकड़ा। भुजाओं का गठाव, यह चैड़ी छाती! दादा कुश्ती करते थे, यह पक्का है। ‘फिर झट से आवाज पलटकर अति विन्रम स्वर में कहता, ‘अजी विलायत में ही रहकर किसी छैल-छबीली के रंग में रंगकर अपना यौवन बिता देते! क्हां यह आपका तारूण्य और उस पर कैसी मुसीबत! भला आपको ये लोहे की बेड़िया पहनने की हौंस क्यों लगी?
कभी वह कहता,‘ न-न! यह घोर कर्म हमारे दादा कर ही नहीं सकते। लगता है, कुछ
‘गोंद्या, तनिक देखो तो हमारे दादा की देह! जैसे सोने का टुकड़ा। भुजाओं का गठाव, यह चैड़ी छाती! दादा कुश्ती करते थे, यह पक्का है। ‘फिर झट से आवाज पलटकर अति विन्रम स्वर में कहता, ‘अजी विलायत में ही रहकर किसी छैल-छबीली के रंग में रंगकर अपना यौवन बिता देते! क्हां यह आपका तारूण्य और उस पर कैसी मुसीबत! भला आपको ये लोहे की बेड़िया पहनने की हौंस क्यों लगी?
कभी वह कहता,‘ न-न! यह घोर कर्म हमारे दादा कर ही नहीं सकते। लगता है, कुछ