‘कहां आ गया?’, ‘हां-हां, ठेठ द्वार पर है।’, ‘कितने हैं?’, ‘कैसे हैं? आादि प्रश्नों तथा उत्तरों की झड़ी लग गई और बंदियों में ही नहीं अपितु सिपाहियों में भी भगदड़ मच गई, क्योंकि वे भी अवश्य ही उतने ऊब चुके होंगे जितने कि ये बंदी। इतने में ‘झन्-झन्’ की गहरी लयबद्व झंकार निकट आने लगी। प्रत्येक बंदीवान अकेला या झुंड बनाकर उस मार्ग के आस-पास पल भर के लिए अनुशासन को ताक पर रखते हुए छिपकर बैठ रहा है। आ गया, चालाान आ गया। कोई अत्यंत उग्र,
‘कहां आ गया?’, ‘हां-हां, ठेठ द्वार पर है।’, ‘कितने हैं?’, ‘कैसे हैं? आादि प्रश्नों तथा उत्तरों की झड़ी लग गई और बंदियों में ही नहीं अपितु सिपाहियों में भी भगदड़ मच गई, क्योंकि वे भी अवश्य ही उतने ऊब चुके होंगे जितने कि ये बंदी। इतने में ‘झन्-झन्’ की गहरी लयबद्व झंकार निकट आने लगी। प्रत्येक बंदीवान अकेला या झुंड बनाकर उस मार्ग के आस-पास पल भर के लिए अनुशासन को ताक पर रखते हुए छिपकर बैठ रहा है। आ गया, चालाान आ गया। कोई अत्यंत उग्र,