उनको यही आशा थी कि आगे चलकर कहीं यह सचमुच जमादार बना तो हमें सहारा देगा- अतः बेचारे अभी से उसकी सेवा-चाकरी में लगे रहते, उसकी ‘हां जी, हां जी’ करते। रास्ते से बंदियों की यह टोली आते ही स्टेशन पर कोई केले, नारियल, खाद्य वस्तुएं, पैसे आदि दान करते। उसमें से पैसे-वैसे मिलने पर ये बंदी अपने इस ‘जमादार’ को दे देते और चुपके से उसके पैर रगड़ते। वह भी उन लोगों को डिगीन साहब या फिर मांटफर्ड साहब से कहकर आज ही मुकादमी का काम दिलवाऊंगा आदि,
उनको यही आशा थी कि आगे चलकर कहीं यह सचमुच जमादार बना तो हमें सहारा देगा- अतः बेचारे अभी से उसकी सेवा-चाकरी में लगे रहते, उसकी ‘हां जी, हां जी’ करते। रास्ते से बंदियों की यह टोली आते ही स्टेशन पर कोई केले, नारियल, खाद्य वस्तुएं, पैसे आदि दान करते। उसमें से पैसे-वैसे मिलने पर ये बंदी अपने इस ‘जमादार’ को दे देते और चुपके से उसके पैर रगड़ते। वह भी उन लोगों को डिगीन साहब या फिर मांटफर्ड साहब से कहकर आज ही मुकादमी का काम दिलवाऊंगा आदि,