का अवसर पाकर सामाजिक आनंद में क्षण भर को मग्न हो गया था। सांझ की वेला अर्थात् इस विद्रोह हेतू उठी बीभत्स भावनाओं तथा विनोद के नंगे नाच की वेला। हर कोठरी से चीखने-चिल्लाने, गाली-गलौज, ठहाकों, अनुच्चारणीय शब्दों का जी भरकर उच्चार आदि बातों की रेलपेल होती और उसमें भी थोड़ी सी कर्तव्यनिष्ठा की गंध आती। मनुष्य स्वभाव कितना विचित्र है! ये अधम-से-अधम व्यक्ति यही समझते कि इस तरह बीभत्स हुल्लड़बाजी करना अपना परम कर्तव्य है। मन को
का अवसर पाकर सामाजिक आनंद में क्षण भर को मग्न हो गया था। सांझ की वेला अर्थात् इस विद्रोह हेतू उठी बीभत्स भावनाओं तथा विनोद के नंगे नाच की वेला। हर कोठरी से चीखने-चिल्लाने, गाली-गलौज, ठहाकों, अनुच्चारणीय शब्दों का जी भरकर उच्चार आदि बातों की रेलपेल होती और उसमें भी थोड़ी सी कर्तव्यनिष्ठा की गंध आती। मनुष्य स्वभाव कितना विचित्र है! ये अधम-से-अधम व्यक्ति यही समझते कि इस तरह बीभत्स हुल्लड़बाजी करना अपना परम कर्तव्य है। मन को