सिर फूटने चाहिए, दो-एक सिपाहियों को उनकी ‘हां जी, हां ज’ करते हुए जैसे-तैसे अपनी जान बचानी चाहिए- तभी उसे चालान कहा जाएगा-तभी उसका नाम सार्थक होगा। अन्यथा, बदमाशों के वे आचार्य, कुलगुरू नूतन सदस्यों को प्रोत्साहित करते हुए कहते,‘फिर बदमाशी क्यों? यही चालान की पूर्व परंपरा है। आज इस नामचीन संस्था का संचालन हमारे हाथ में आने के कारण हमारा कर्तव्य है कि हम वह परंपरा निभाएं। चीखो, चिल्लाओं, नाचो गालियां दो। चालान का नाम रोशन करना चाहिए न भाई!’
सिर फूटने चाहिए, दो-एक सिपाहियों को उनकी ‘हां जी, हां ज’ करते हुए जैसे-तैसे अपनी जान बचानी चाहिए- तभी उसे चालान कहा जाएगा-तभी उसका नाम सार्थक होगा। अन्यथा, बदमाशों के वे आचार्य, कुलगुरू नूतन सदस्यों को प्रोत्साहित करते हुए कहते,‘फिर बदमाशी क्यों? यही चालान की पूर्व परंपरा है। आज इस नामचीन संस्था का संचालन हमारे हाथ में आने के कारण हमारा कर्तव्य है कि हम वह परंपरा निभाएं। चीखो, चिल्लाओं, नाचो गालियां दो। चालान का नाम रोशन करना चाहिए न भाई!’