स्वयं पहल करके किसी का नाम नहीं पूछा। उनके संभाषण में प्रायः। आदरभाव और कम-से-कम शिष्टता तो
दिखाई देती थी। इक्का-दूक्का गोरा उद्दंड होता था। यदि इस तरह कोई आता तो वह मेरी मुद्रा भी वैसी ही पाता। आता और जाता, मैं भी उसे कुछ नहीं गिनता।
मोगलाई मैदान
प्रायः मेरे डिब्बे की खिड़कियां बंद रहती । डिब्बे के दूसरे हिस्से में, जो लोहे के सीखचों से मेरे हिस्से से अलग किया गया था, कालेपानी के सारे बंदी धमाचैकड़ी मचा रहे हैं। गरमी के दिन। अंगार बरसाती चिलचिलाती धूप,
स्वयं पहल करके किसी का नाम नहीं पूछा। उनके संभाषण में प्रायः। आदरभाव और कम-से-कम शिष्टता तो
दिखाई देती थी। इक्का-दूक्का गोरा उद्दंड होता था। यदि इस तरह कोई आता तो वह मेरी मुद्रा भी वैसी ही पाता। आता और जाता, मैं भी उसे कुछ नहीं गिनता।
मोगलाई मैदान
प्रायः मेरे डिब्बे की खिड़कियां बंद रहती । डिब्बे के दूसरे हिस्से में, जो लोहे के सीखचों से मेरे हिस्से से अलग किया गया था, कालेपानी के सारे बंदी धमाचैकड़ी मचा रहे हैं। गरमी के दिन। अंगार बरसाती चिलचिलाती धूप,