तो रूस से साइबेरिया जात राजनीतिक बंदियों की टोलियांे की यात्रा में जो दुर्गध बनी थी, उसका स्मरण करके मैं अपने मन को समझाता, ‘अरे, अभी भोगा ही क्या है तमने? यह कोई कहने की बात थोडे़ ही है? जो करेगा सो भरेगा। जो भरेगा सो करेगा।’
गांव के पीछे गांव, नगरों के पीछे नगर छोड़ती हुई, वन-उपवन, पर्वत, नदी-नालों को पार करती वह रेलगाड़ी किसी हड़काई हुई शेरनी की तरह मुझे मुहं में दबाए भागती जा रही थी। हाय-हाय! जितनी तीव्र गति के साथ
तो रूस से साइबेरिया जात राजनीतिक बंदियों की टोलियांे की यात्रा में जो दुर्गध बनी थी, उसका स्मरण करके मैं अपने मन को समझाता, ‘अरे, अभी भोगा ही क्या है तमने? यह कोई कहने की बात थोडे़ ही है? जो करेगा सो भरेगा। जो भरेगा सो करेगा।’
गांव के पीछे गांव, नगरों के पीछे नगर छोड़ती हुई, वन-उपवन, पर्वत, नदी-नालों को पार करती वह रेलगाड़ी किसी हड़काई हुई शेरनी की तरह मुझे मुहं में दबाए भागती जा रही थी। हाय-हाय! जितनी तीव्र गति के साथ