वह मुझे अपनी मातृभूमि से कालेपानी की ओर खींचती हुई ले जा रही है उतनी ही तीव्र गति से वह कालेपानी से अपनी मातृभूमि पर मुझे कब लाएगी? कभी लाएगी भ्ज्ञी कि नहीं? कैसे लाएगी? यह आशा करना एक मानसिक आश्चर्य ही है। साइबेरिया में भी‘रूस! हाय मेरा रूस’ करते-करते मेरे भी प्राण पखेरू उड़ जाएंगे।
मद्रास आ गया। लेल से उतरते ही मुझे एक तरफ सभी बंदियों से अलग करके पहरे में रखा गया। गाड़ी के साथ एक यूरोपियन अधिकारी बड़ी दूर से आया था। हो सकता है,
वह मुझे अपनी मातृभूमि से कालेपानी की ओर खींचती हुई ले जा रही है उतनी ही तीव्र गति से वह कालेपानी से अपनी मातृभूमि पर मुझे कब लाएगी? कभी लाएगी भ्ज्ञी कि नहीं? कैसे लाएगी? यह आशा करना एक मानसिक आश्चर्य ही है। साइबेरिया में भी‘रूस! हाय मेरा रूस’ करते-करते मेरे भी प्राण पखेरू उड़ जाएंगे।
मद्रास आ गया। लेल से उतरते ही मुझे एक तरफ सभी बंदियों से अलग करके पहरे में रखा गया। गाड़ी के साथ एक यूरोपियन अधिकारी बड़ी दूर से आया था। हो सकता है,