मेरा आजीवन कारावास - Mera Aajivan Karavas



जलयान की गंदगी

कुछ देर बाद संध्या हो गई। गरमी से जान निकलती, तिसपर इतना भीड़-भड़का। उन चालीस-पचास लोगों में, जिनमें हिंदु-मुसलमान सब थे, कुछ तो घिनौने जीवन के अभ्यस्त बनकर निर्लज्ज बने हुए थे; चोर-उचक्के, डाकू, पापी-दुष्ट, असाघ्य इंद्रिय रोग से ग्रस्त; कुछ ऐसे घिनौने, जिन्होंने वर्षों से दांत भी नहीं मांजे थे। इस तरह के चालीस-पचास आदमियों की बिछौनों पर बिछौने बिछाए हुई भीड़भाड़ में मैं भी अपना बिस्तर बिछाकर लेट गया। मेरे


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जलयान की गंदगी

कुछ देर बाद संध्या हो गई। गरमी से जान निकलती, तिसपर इतना भीड़-भड़का। उन चालीस-पचास लोगों में, जिनमें हिंदु-मुसलमान सब थे, कुछ तो घिनौने जीवन के अभ्यस्त बनकर निर्लज्ज बने हुए थे; चोर-उचक्के, डाकू, पापी-दुष्ट, असाघ्य इंद्रिय रोग से ग्रस्त; कुछ ऐसे घिनौने, जिन्होंने वर्षों से दांत भी नहीं मांजे थे। इस तरह के चालीस-पचास आदमियों की बिछौनों पर बिछौने बिछाए हुई भीड़भाड़ में मैं भी अपना बिस्तर बिछाकर लेट गया। मेरे


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