विष्ठा का पीपा अपनी ही पीठ पर ढोना पड़ता है? तुम उसे लाख वस्त्रों की आड़ में छिपा लो तथापि ढकने से भी वह खुला-का-खुला ही रहेगा, चारों ओर दुर्गघि छोड़ेगा। समर्थ रामदास स्वामी ने यह स्पष्ट कहा है-
‘भक्षण करते ही सुग्रास अन्न। आधी विष्ठा आधा वमन।
पीते ही भागीरथी का जीवन। मूत्र होय तत्काल।’
तो फिर ‘चाहे राजा हो या रंक। पेट में विष्ठा नहीं चुकती।’ यह यदि सत्य है तो अपने आपके मल-मूत्र का उपसर्ग जिस तरह अनिवार्य समझकर तुम
विष्ठा का पीपा अपनी ही पीठ पर ढोना पड़ता है? तुम उसे लाख वस्त्रों की आड़ में छिपा लो तथापि ढकने से भी वह खुला-का-खुला ही रहेगा, चारों ओर दुर्गघि छोड़ेगा। समर्थ रामदास स्वामी ने यह स्पष्ट कहा है-
‘भक्षण करते ही सुग्रास अन्न। आधी विष्ठा आधा वमन।
पीते ही भागीरथी का जीवन। मूत्र होय तत्काल।’
तो फिर ‘चाहे राजा हो या रंक। पेट में विष्ठा नहीं चुकती।’ यह यदि सत्य है तो अपने आपके मल-मूत्र का उपसर्ग जिस तरह अनिवार्य समझकर तुम