शांत लेटे रहते हो इसी तरह उनके उपसर्ग को भी तुम क्यों सह नहीं लेते? इस जगत् में देह धारणा के रेचन करके पुन्ः कुछ इंद्रियों को जो प्रिय है, वह अन्य इंद्रियों के लिए असहनीय क्यों किया गया? प्रकृति का यह न्याय वही जाने कि एक देह की इंद्रियों में भी यह विषम परस्पर विद्वेष क्यों उत्पन्न किया? अथवा हो सकता है, उसका उपाय न हो अथवा उनके उस परस्पर कलह से उसे आनंद हो रहा हो।
और फिर इस तरह विवेक सेना को विद्रोही इंद्रियों के पीछे
शांत लेटे रहते हो इसी तरह उनके उपसर्ग को भी तुम क्यों सह नहीं लेते? इस जगत् में देह धारणा के रेचन करके पुन्ः कुछ इंद्रियों को जो प्रिय है, वह अन्य इंद्रियों के लिए असहनीय क्यों किया गया? प्रकृति का यह न्याय वही जाने कि एक देह की इंद्रियों में भी यह विषम परस्पर विद्वेष क्यों उत्पन्न किया? अथवा हो सकता है, उसका उपाय न हो अथवा उनके उस परस्पर कलह से उसे आनंद हो रहा हो।
और फिर इस तरह विवेक सेना को विद्रोही इंद्रियों के पीछे