उसे खंड-खंड कर सुपारी जैसा सटक जाएगा। तब किसी को पता भी नहीं चलेगा कि यहां पर कभी एशिया महाद्वीप था या नहीं। कितना ‘यः कश्चित्’ है मानव-‘यः
कश्चित्’ मनुष्य के बीच मैं कितना ‘यत्किंचित्कर’ हो गया हूं!! आज इन अधम, नीच तथा दुष्ट दंडितों, जो अपना शरीर समेटकर बैठे हैं, की पंक्ति में एक उपेक्षित कोने में मैं भी अपना शरीर समेटकर उकड़ूॅं बैठा हूॅं। हाथों में हथकड़ी, पाॅंवों में बड़ियांॅ- इतना श्रुद्र, तुच्छ बन गया हूं कि इस जहाज
उसे खंड-खंड कर सुपारी जैसा सटक जाएगा। तब किसी को पता भी नहीं चलेगा कि यहां पर कभी एशिया महाद्वीप था या नहीं। कितना ‘यः कश्चित्’ है मानव-‘यः
कश्चित्’ मनुष्य के बीच मैं कितना ‘यत्किंचित्कर’ हो गया हूं!! आज इन अधम, नीच तथा दुष्ट दंडितों, जो अपना शरीर समेटकर बैठे हैं, की पंक्ति में एक उपेक्षित कोने में मैं भी अपना शरीर समेटकर उकड़ूॅं बैठा हूॅं। हाथों में हथकड़ी, पाॅंवों में बड़ियांॅ- इतना श्रुद्र, तुच्छ बन गया हूं कि इस जहाज